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भक्तामर स्तोत्र

जैन वाणी का शांत संग्रह

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आज का पाठ

उन्निद्रहेम-नवपंकजपुंजकान्ती पर्युल्लसन्-नखमयूखशिखाभिरामौ।

हे जिनेन्द्र! विकसित स्वर्ण-कमलों के समूह की कान्ति वाले, चारों ओर उल्लसित नख-किरणों की शिखाओं से अभिराम आपके चरण जहाँ पद रखते हैं, वहाँ देवगण कमलों की रचना कर देते हैं।

भक्तामर स्तोत्र · श्लोक 32

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